इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं की खराब स्थिति पर चिंता जताते हुए सीएम से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने एटा के एक दुष्कर्म व हत्या के मामले में आरोपी मनोज को जमानत देते हुए कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव में उसे जेल में रखना उचित नहीं है।
मामला एटा के सकीट क्षेत्र का है, जहां 18 नवंबर 2025 को गोबर फेंकने गई महिला का शव नदी किनारे मिला था। अगले दिन अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। जबकि बाद में एक कथित चश्मदीद के बयान पर मनोज को आरोपी बनाया गया। पुलिस ने मृतका की घड़ी बरामद करने का दावा किया। वहीं, अदालत ने माना कि केवल घड़ी की बरामदगी से दुष्कर्म और हत्या में संलिप्तता सिद्ध नहीं होती।
कोर्ट ने 14 मई 2026 की एफएसएल रिपोर्ट का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि आरोपी का डीएनए मृतका के शरीर से मिले नमूने से मेल नहीं खाता। क्योंकि, डीएनए प्रोफाइल ही तैयार नहीं हो सका। इसे जांच की बड़ी खामी बताते हुए अदालत ने कहा कि प्रदेश की अधिकांश फॉरेंसिक लैब स्टाफ और आधुनिक उपकरणों की कमी से जूझ रही हैं। ऐसी स्थिति के लिए राज्य सरकार जिम्मेदार है। कोर्ट ने कहा कि जघन्य अपराध में भी वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध न होने के कारण उसे भारी मन से जमानत देनी पड़ रही है।
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